Thursday, 1 December 2011

मीरा बनने के चक्कर

मीरा बनने के चक्कर में, किस-किस ने घर न छोड़ा,
कौन-कौन कहाँ न फंसी, किस-किस ने कब है छोड़ा,

बहुत बेदर्द कहानी है, हर स्त्री की जुबानी है,
बात बहुत पुरानी है, झेली यह जिंदगानी है,

घर से बाहर कदम रखा, हर आँख ने तक के रखा,
मंसूबा सभी ने बना के रखा, महबूबा बक के कहा,

क्या बयाँ करूँ दास्ताँ, मेरी भी वही है,
मैं तो चुप ही रह गई, तुने बात कही है,

                                  .....  सियाना मस्कीनी


.


.

Saturday, 1 October 2011

आग कहते हैं, औरत को

आग कहते हैं, औरत को,
भट्टी में बच्चा पका लो,
चाहे तो रोटियाँ पकवा लो,
चाहे तो अपने को जला लो,

बिना इसकी तपिस से तपे,
आज तक कोई न,निकला,
चाहे वो बच्चा बन निकला,
चाहे विश्वामित्र बन निकला,

चिंगारी इसी की लिए,
बाती अपनी जला ली,
किसी ने घर फूँक लिए,
किसी ने देह जला ली,

रोशन जहाँ हुआ है,
रौशनी इसके पास है,
न भाग इससे यूँ ही,
इसी का तो प्रकाश है,
                 .....  सियाना मस्कीनी


.