Saturday, 1 October 2011

आग कहते हैं, औरत को

आग कहते हैं, औरत को,
भट्टी में बच्चा पका लो,
चाहे तो रोटियाँ पकवा लो,
चाहे तो अपने को जला लो,

बिना इसकी तपिस से तपे,
आज तक कोई न,निकला,
चाहे वो बच्चा बन निकला,
चाहे विश्वामित्र बन निकला,

चिंगारी इसी की लिए,
बाती अपनी जला ली,
किसी ने घर फूँक लिए,
किसी ने देह जला ली,

रोशन जहाँ हुआ है,
रौशनी इसके पास है,
न भाग इससे यूँ ही,
इसी का तो प्रकाश है,
                 .....  सियाना मस्कीनी


.

5 comments:



  1. स्वागतम् !


    आपको नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  2. आपका जगत में आपका स्वागत है..... बधाई स्वीकारें !
    बेहतरीन भावपूर्ण रचना के लिए भी बधाई।
    अच्छी रचना है ....
    मन को गहरे तक छू गई एक-एक पंक्ति...

    ReplyDelete
  3. soch ki nayi bulandiyon ko chhuuti pravaahmay rachna jo shabdo me aag liye hue hai.

    ReplyDelete
  4. रोशन जहाँ हुआ है,
    रौशनी इसके पास है,
    न भाग इससे यूँ ही,
    इसी का तो प्रकाश है,

    सुंदर पंक्तियाँ.....मन को उद्वेलित करती रचना

    ReplyDelete